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Influence (Hindi/हिंदी में)

Channel: SyllabuswithRohit

और मैं यह बात खुलेआम मान सकता हूं। अपनी

पूरी जिंदगी में बस एक बकरा बना रहा। जहां

तक मुझे याद है मैं फेरी वालों, चंदा

मांगने वालों और हर तरह के लोगों के लिए

एक आसान निशाना रहा हूं।

सच तो यह है कि इनमें से कुछ ही लोगों की

नियत खराब थी। बाकी तो अच्छे इरादे वाले

थे। मगर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

अक्सर मेरे पास ऐसी मैगजीन आ जाती थी

जिनकी मुझे जरूरत नहीं थी या मैं ऐसी

पार्टियों के टिकट खरीद लेता था जहां मुझे

जाना ही नहीं था।

शायद सालों तक बकरा बने रहने की इसी हालत

ने मुझे बात मनवाना सीखने की तरफ धकेला।

आखिर वह कौन से बटन हैं जिन्हें दबाकर एक

इंसान दूसरे को हां बोलने पर मजबूर कर

देता है और कौन से ऐसे तरीके हैं जो इन

बटनों का इस्तेमाल करके बड़ी सफाई से काम

निकाल लेते हैं मैं हमेशा यह सोचकर हैरान

होता था कि एक ही बात को अगर एक तरीके से

कहें तो लोग मना कर देते हैं। लेकिन वही

काम अगर थोड़े अलग अंदाज में कहें तो लोग

झड़ से मान जाते हैं।

तो दिमाग के खेल के जानकार के तौर पर

मैंने इस पर खोज शुरू की। शुरू में मैंने

अपनी लैब में कॉलेज के लड़कों पर कुछ

प्रयोग किए। मैं जानना चाहता था कि वह कौन

से तरीके हैं जो इंसान को हां की तरफ खींच

ले जाते हैं। आजकल जानकारों को इन

प्रिंसिपल्स के बारे में काफी कुछ पता है।

मैंने इन्हें दिमाग के हथियार वेपंस ऑफ

इन्फ्लुएंस का नाम दिया है। और आगे मैं

आपको इन्हीं सबसे जोरदार हथियारों के बारे

में बताऊंगा।

कुछ समय बाद मुझे समझ आया कि सिर्फ लैब

में बैठकर काम नहीं चलेगा। अगर इस दिमाग

के खेल को पूरी तरह समझना है तो मुझे उन

खिलाड़ियों को देखना होगा जिन्होंने पूरी

जिंदगी मुझे अपना शिकार बनाया है।

उन्हें पता है कि क्या चलता है और क्या

नहीं। उनका तो घर ही इसी बात पर चलता है

कि वह हमसे अपनी बात मनवा सके। जो हां

नहीं बुलवा पाते वह इस बाजार से बाहर हो

जाते हैं। जो उस्ताद हैं, जो एक्सपर्ट है

वही टिके रहते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ

वही लोग यह चाले जानते हैं। हम सब अपने

पड़ोसी, दोस्त या बच्चों के साथ कभी ना

कभी यह खेल खेलते हैं। मगर यह दिमाग से

खेलने वाले खिलाड़ी इस खेल के असली उस्ताद

[संगीत] हैं। करीब 3 साल तक मैंने इन

खिलाड़ियों की दुनिया सेल्समैन, चंदा

मांगने वाले, भर्ती करने वाले और विज्ञापन

बनाने वालों के बीच गुजारे।

मेरा मकसद अंदर घुसकर उनकी चाले और पैंतरे

सीखना था। कभी मैंने खुद उनसे बात की तो

कभी पुलिस वालों से जो इन ठगों को पकड़ते

हैं। मैंने उनकी सीक्रेट किताबें और

ट्रेनिंग के सामान भी छान मारे।

सबसे ज्यादा मैंने जासूस बनकर काम किया।

अपनी पहचान छुपाकर मैं उनके बीच रहने लगा।

जब मुझे सेल्स वालों की चाले समझनी थी तो

मैं खुद सेल्स की ट्रेनिंग लेने पहुंच

गया। मैंने विज्ञापन और चंदा मांगने वाली

एजेंसियों में भी घुसपैठ की। इस किताब में

जो भी सबूत दिए गए हैं वह मेरा खुद का

अनुभव है। जब मैं उनकी तरह बनकर लोगों से

हां बुलवाने की ट्रेनिंग ले रहा था।

इन तीन सालों में मैंने एक बहुत बड़ी बात

सीखी। भले ही हां बुलवाने के हजारों तरीके

हो पर वह सब घूम फिर कर सिर्फ छह कैटेगरीज

में आते हैं। सिर्फ छह खानों में हर

कैटेगरी के पीछे हर खाने के पीछे दिमाग का

एक गहरा नियम काम करता है। जो इंसानी

व्यवहार को चलाता है। यही नियम उन चालों

को ताकत देते हैं। यह किताब इनहीं छह

सिद्धांतों ही छह प्रिंसिपल्स पर टिकी है।

पहला कंसिस्टेंसी

यानी जबान का पक्का। दूसरा रेसिप्रोकेशन

यानी लेनदेन का चक्कर। तीसरा सोशल प्रूफ

यानी भेड़चाल। चौथा अथॉरिटी यानी बड़े आदमी

की धौस।

फिर पांचवा लाइकिंग यानी पसंद या नापसंद।

और छठा स्केसिटी यानी आखिरी मौका।

मैंने इसमें एक बहुत ही आम बात शामिल नहीं

की कि लोग कम पैसों में ज्यादा सामान

चाहते हैं। यह तो सबको पता है। इसमें कोई

बड़ा राज नहीं है। मेरा असली मकसद यह

देखना है कि यह नियम कैसे हमें दिमाग की

नींद में धकेल देते हैं। यानी हम बिना

सोचे समझे हां बोल देते हैं। आज की

भागदौड़ भरी जिंदगी में यह दिमाग की नींद

और गहरी होती जा रही है।

आप जिसे अपनी मर्जी समझ रहे थे, वह तो

किसी और का बुना हुआ जाल था।

इस नई किताब में मैंने उन लोगों की

कहानियां भी डाली है जिन्होंने मेरी किताब

पढ़कर इन जालों को पकड़ लिया। यह कहानियां

दिखाती हैं कि कैसे हम हर रोज इस दिमाग के

खेल के शिकार बनते हैं।

चैप्टर वन वेपंस ऑफ इनफ्लुएंस।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि चीजों को

जितना हो सके आसान बनाओ। पर इतना भी नहीं

कि उनका मतलब ही खत्म हो जाए।

मेरी एक सहेली ने एरिजोना में गहनों की एक

दुकान खोली। एक दिन उसका फोन आया। वह बड़ी

हैरान थी। उसने बताया कि उसकी दुकान में

फिरोजा के कुछ पत्थर थे जो बिक ही नहीं

रहे थे। टूरिस्टों का सीजन था। दुनिया में

ग्राहकों की भीड़ थी। पत्थरों की क्वालिटी

भी अच्छी थी और दाम भी सही थे। फिर भी कोई

उन्हें हाथ नहीं लगा रहा था। मेरी सहेली

ने उन्हें बेचने के लिए सारे पुराने पैतरे

आजमा लिए। उन्हें दुकान के बीचोंबीच रख

दिया। अपने सेल्स वालों से कहा कि

ग्राहकों को इन पत्थरों के बारे में

ज्यादा बताएं। मगर कुछ काम नहीं आया। आखिर

में एक दिन बाहर जाते वक्त उसने झुझलाकर

अपने मैनेजर के लिए एक पर्ची [संगीत]

छोड़ी। इस शोकेस के सारे सामान की कीमत

आधा यानी मल्टीप्लाई बाय 1/2 कर दो। उसे

लगा कि कम से कम नुकसान उठाकर जान तो

छूटेगी।

कुछ दिनों बाद जब वह आई तो वह देखकर दंग

रह गई कि सारे पत्थर बिक चुके थे। मगर

असली झटका तब लगा जब उसे पता चला कि उसकी

मैनेजर ने पर्ची की लिखावट को गलत समझ

लिया था। उसने 1/2 को टू समझ लिया और वह

सारे पत्थर दोगुनी कीमत पर बिक गए। उसने

मुझे फोन किया। मुझे अंदाजा था कि क्या

हुआ है। पर उसे समझाने के लिए मैंने उसे

एक कहानी सुनाई। यह मेरी कहानी नहीं है।

यह मम्मी टर्की की कहानी है।

टर्की परिंदे की जो मां होती है, वह बड़ी

प्यारी और अपने बच्चों का ख्याल रखने वाली

होती है। वो अपना सारा समय बच्चों को

खिलाने, साफ करने और उन्हें अपने पंखों

में छिपाकर गर्माहट देने में बिताती है।

मगर इस ममता के पीछे एक अजीब लोचा है।

टर्की मां की यह सारी ममता सिर्फ एक चीज

से जागती है। बच्चों की छी छची वाली आवाज

से। बच्चों की खुशबू, उनकी शक्ल या उन्हें

छूने से मां को कोई खास फर्क नहीं पड़ता।

अगर बच्चा ची करेगा तो मां उसका ख्याल

रखेगी। अगर नहीं करेगा तो मां उसे छोड़

देगी या कभी-कभी तो जान से मार भी देगी।

एनिमल वैज्ञानिकों ने एक कमाल का

एक्सपेरिमेंट किया। का एक पुराना दुश्मन

होता है नेवला। अगर नेवला पास आए तो टर्की

मां चीखने, चिल्लाने और चोंच मारने लगती

है।

वैज्ञानिकों ने नेवले का एक पुतला बनाया

और उसे एक डोरी से टर्की मां की तरफ

खींचा। मां ने तुरंत उसे पहचान कर उस पर

हमला कर दिया। मगर जैसे ही उस पुतले के

अंदर एक टेप रिकॉर्डर रखकर बच्चों की

खींची वाली आवाज बजाई गई, टर्की मां ने ना

केवल उसने ओलो को अपने पास आने दिया बल्कि

उसे अपने पंखों के नीचे छिपा लिया। जैसे

ही आवाज बंद की गई, उसने फिर से हमले शुरू

कर दिए।

सोचिए वो टर्की मां कितनी बेवकूफ लग रही

है। सिर्फ ची सुनकर अपने दुश्मन को गले

लगा रही है और आवाज ना मिलने पर अपने ही

बच्चे को मार रही है। वो एक मशीन की तरह

लग रही है जिसकी ममता का बटन सिर्फ उस एक

आवाज के हाथ में है। वैज्ञानिकों का कहना

है कि यह सिर्फ टर्की के साथ नहीं होता।

बहुत सारे जानवरों के दिमाग में ऐसी दिमाग

की पुरानी रिकॉर्डिंग होती है। इन्हें हम

दिमाग के फिक्स्ड तरीके कह सकते हैं। यह

एक टेप की तरह है। जब भी कोई खास मौका आता

है, वह टेप चालू हो जाता [संगीत] है। यानी

बटन दबा और टेप चालू। सबसे मजेदार बात यह

है कि यह टेप चालू कैसे होते हैं? हर टेप

का एक मेन बटन होता है। एक ट्रिगर फीचर

जैसे चिड़िया के मामले में एक रॉबिन

चिड़िया के मामले में अगर उसे अपने इलाके

में किसी दूसरी चिड़िया के लाल पंख दिख

जाए तो वह उस पर हमला कर देगी। उसे पूरी

चिड़िया देखने की जरूरत नहीं है। सिर्फ

लाल पंख उसका बटन दबाने के लिए काफी है।

हमें लग रहा होगा कि यह जानवर कितने बुद्ध

हैं। मगर हम इंसान भी कम नहीं है। हमारे

दिमाग में भी ऐसे ही बटन फिट है। वैसे तो

यह बटन हमारे काम आसान करते हैं। पर कुछ

उस्ताद खिलाड़ी इन बटनों का इस्तेमाल करके

हमें दिमाग की नींद में धकेल देते हैं।

एक प्रोफेसर ने एक एक्सपेरिमेंट किया।

लाइब्रेरी में फोटोकपी की मशीन पर लाइन

लगी थी। उसने एक लड़की से कहा कि जाकर

लाइन तोड़ो। पहली बार लड़की ने कहा, माफ

करना मेरे पास पांच पेज हैं। क्या मैं

मशीन इस्तेमाल कर लूं? क्योंकि मैं जल्दी

में हूं।

94% लोगों ने उसे रास्ता दे दिया। दूसरी

बार उसने सिर्फ इतना कहा, "मेरे पास पांच

पेज हैं। क्या मैं मशीन इस्तेमाल कर लूं?

इस बार सिर्फ 60% लोग माने। मगर असली खेल

तीसरी बार में था। उसने कहा माफ करना मेरे

पास पांच पेज [संगीत] हैं। क्या मैं मशीन

इस्तेमाल कर लूं? क्योंकि मुझे फोटोकपी

करानी है। आप गौर कीजिए फोटोकपी की लाइन

में खड़े होकर हर इंसान को फोटोकपी ही

करानी है। कोई नई बात नहीं थी। पर फिर भी

93% लोग मान गए। क्यों? क्योंकि उस लड़की

ने क्योंकि शब्द का इस्तेमाल किया।

इंसान के दिमाग के लिए क्योंकि एक मेन बटन

है। जैसे ही यह शब्द कानों में पड़ता है,

हमारा दिमाग सोचने की मेहनत छोड़ देता है

और हां बोलता है। अब उस दुकान वाली बात पर

वापस आते हैं। उन ग्राहकों ने वह पत्थर

दोगुने दाम पर क्यों खरीदे? क्योंकि वह

अमीर टूरिस्ट थे और उन्हें पत्थरों की कोई

समझ नहीं थी। उनके दिमाग में एक शॉर्टकट

फिट था कि महंगा यानी अच्छा। उनके लिए

कीमत ही क्वालिटी का बटन बन गई। जैसे ही

कीमत बढ़ी उनके दिमाग का टेप चला कि महंगा

है तो पक्का अच्छा ही होगा और उन्होंने सब

खरीद लिया। वो टूरिस्ट बेवकूफ नहीं थे। वह

बस एक पुराने नियम पर चल रहे थे। जितना

गुड़ डालेंगे उतना मीठा होगा। असल जिंदगी

में ज्यादातर महंगी चीजें अच्छी होती हैं।

इसलिए उन्होंने इसी शॉर्टकट को अपना लिया।

उन्होंने दिमाग की मेहनत बचाने के लिए

सिर्फ कीमत पर दांव खेला। इस बार वह हार

गए। पर अक्सर वह इसी शॉर्टकट की वजह से

सही फैसला ले पाते हैं।

हमारी दुनिया बहुत उलझी हुई है। हमारे पास

इतना वक्त और दिमाग नहीं है कि हम हर चीज

की बारीकी से जांच करें। इसलिए हम इन

शॉर्टकट्स का सहारा लेते हैं। हम चीजों को

कुछ निशानों से पहचानते हैं और बिना सोचे

समझे फैसला ले लेते हैं।

दुनिया के बड़े-बड़े उस्तादों ने कहा है

कि तरक्की वही है जब हम बिना सोचे समझे

ज्यादा से ज्यादा काम कर सकें। जैसे

डिस्काउंट कूपन। हम मान लेते हैं कि कूपन

है तो सस्ता ही होगा। एक टायर कंपनी ने

गलती से ऐसे कूपन भेज दिए जिनसे कोई बचत

नहीं हो रही थी। फिर भी लोगों ने उतने ही

टायर खरीदे जितने सही कूपन से खरीदते थे।

कूपन हमारे लिए सिर्फ पैसा नहीं बचा था।

वह हमारा दिमाग चलाने का कष्ट भी बचाता

है। मगर यहां पर दिक्कत है कि यह बटन हमें

उन लोगों के सामने बहुत कमजोर बना देते

हैं जो इन बटनों को दबाना जानते हैं।

जंगल में कुछ ऐसे जीव होते हैं जिन्हें हम

नकलची कहते हैं। मिमिक्स जैसे खास तरह की

फीमेल फायर फ्लाई यानी जुगनू मादा।

वह दूसरे प्रजाति के जुगनू की लाइट वाली

भाषा की नकल करती है। जैसे ही बेचारा मेल

जुगनू सोचता है कि उसे प्यार मिल रहा है।

वह पास आता है और फीमेल उसे खा जाती है।

शिकार अपने ही दिमाग की रिकॉर्डिंग की वजह

से मारा जाता है। इंसानों के जंगल में भी

ऐसे ही खिलाड़ी घूम रहे हैं। यह

एक्सप्लाइटर्स

जो जानते हैं कि हमारे दिमाग के हथियार

कहां छिपे हैं। वो बस एक सही शब्द बोलेंगे

या एक सही पैतरा चलेंगे और हम उनके जाल

में फंस जाएंगे।

मेरी सहेली ने भी अब जानबूझकर महंगा यानी

अच्छा वाले बटन का इस्तेमाल करना शुरू कर

दिया है। वह चीजों के दाम बढ़ा देती है और

फिर लिख देती है। पहले इतना दाम था अब कम

कर दिया है। लोग खुशी-खुशी उसे खरीद लेते

हैं। एक और पुरानी कहानी सुनिए। सीड और

हैरी नाम के दो भाई टेलर की दुकान चलाते

थे। जब भी कोई ग्राहक सूट पहनकर दाम पूछता

[संगीत] सिड जो कम सुनने का नाटक करता था

अपने भाई से चिल्लाकर पूछता हैरी इस सूट

का क्या दाम है? हैरी कहता उस शानदार मुनी

सूट की कीमत

$2 है। सेड ग्राहक की तरफ मुड़ता और कहता

वह $2 कह रहा है। ग्राहक फटाफट $2 देता और

इससे पहले कि सिड को अपनी गलती पता चले

सूट लेकर भाग जाता। ग्राहक को लगता उसने

बहुत सस्ता माल खरीद लिया। पर असल में वह

महंगा यानी [संगीत] अच्छा इसके जाल में

फंस चुका था। इन हथियारों की सबसे बड़ी

ताकत यह है कि यह दिखते नहीं है। यह दिमाग

की कुश्ती की तरह है। इसमें खिलाड़ी अपनी

ताकत नहीं लगाता। बल्कि अपनी ही दिमागी

कंडीशनिंग का इस्तेमाल आपके खिलाफ करता

है। आपको लगेगा कि फैसला आपका है। पर सच

तो यह है कि बटन किसी और ने दबाया है।

एक और तरीका है फर्क का खेल द कंट्रास्ट

प्रिंसिपल।

अगर हम पहले कोई हल्की चीज उठाएं और फिर

भारी तो वह हमें और भी ज्यादा भारी लगेगी।

अगर आप किसी बहुत सुंदर औरत से बात करने

के बाद किसी साधारण औरत से मिले तो वह

आपको अपनी असलियत से भी कम सुंदर लगेगी।

कपड़ों की दुकान वाले इसका खूब इस्तेमाल

करते हैं। वह सेल्स वालों को सिखाते हैं

पहले सबसे महंगा सूट दिखाओ। जब ग्राहक 500

का सूट खरीद लेता है तो उसे 5,000 का

स्वेटर बहुत सस्ता लगता है। अगर आप पहले

स्वेटर दिखाएंगे तो उसे वह महंगा लगेगा।

प्रॉपर्टी बेचने वाले भी यही करते हैं। वह

पहले एक दो खटारा घर दिखाते हैं जिनके दाम

बहुत ज्यादा होते हैं। उन्हें वह घर बेचने

नहीं होते। वह तो बस सेटअप होते हैं। जब

ग्राहक उन घरों को देखकर दुखी हो जाता है

तब वह उसे असली घर दिखाते हैं। वह घर उन

खटारा घरों के मुकाबले स्वर्ग जैसा लगता

है।

गाड़ी वाले भी यही काम करते हैं। जब आप

लाखों की गाड़ी का सौदा कर लेते हैं तो वह

आपको छोटी-छोटी चीजें बताते हैं। म्यूजिक

सिस्टम, खिड़की के शीशे, टायर। गाड़ी की

बड़ी कीमत के सामने यह छोटे खर्चे मामूली

लगते हैं। आप कागज पर दस्तखत करते वक्त

मुस्कुरा रहे होते हैं और डीलर मन ही मन

दिमाग की कुश्ती का आनंद ले रहा होता है।

एक कॉलेज की लड़की की चिट्ठी का एग्जांपल

लीजिए।

प्यारे मम्मी पापा कॉलेज आने के बाद

चिट्ठी लिखने में देर हो गई। उसके लिए

माफी। अब मैं आपको सब बताते हूं। पर पढ़ने

से पहले बैठ जाइए। हॉस्टल में आग लगने की

वजह से जब मैंने खिड़की से छलांग लगाई थी

तो मेरे सिर की हड्डी टूट गई थी। पर अब

घाव भर रहा है। तो वह भला हो पास के

पेट्रोल पंप वाले लड़के का जिसने एंबुलेंस

बुलाई। हॉस्टल जल गया था। इसलिए उसने मुझे

अपने कमरे में रहने की जगह दी। वो बहुत

अच्छा लड़का है। हमें प्यार हो गया और हम

शादी करने वाले हैं। शादी की तारीख तय

नहीं है। पर मेरे बच्चे के होने से पहले

हम कर लेंगे।

हां, मैं प्रेग्नेंट हूं। मुझे पता है आप

नाना नानी बनने के लिए बेताब होंगे।

अब असली बात ना कोई आग लगी, ना मेरी हड्डी

टूटी, ना मैं प्रेग्नेंट हूं और ना मेरा

कोई बॉयफ्रेंड है। सच तो यह है कि मैं

इतिहास में फेल हो गई हूं और केमिस्ट्री

में मेरे नंबर कम आए हैं। मैं बस चाहती थी

कि आप इन कम नंबरों को सही नजरिए से

देखें।

वह लड़की भले ही केमिस्ट्री में फेल हो गई

हो, पर दिमाग के खेल में उसे पूरे नंबर

मिलते हैं। उसने पहले बहुत बड़ी मुसीबतें

गिनाई ताकि उसके खराब नंबर उनके सामने

छोटे लगे। यही है फर्क का खेल।

अब चलते हैं चैप्टर टू की तरफ जो है

रेसिप्रोकेशन।

यानी लेनदेन का चक्कर।

कुछ साल पहले यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर

ने एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट किया।

उन्होंने बिल्कुल अनजान लोगों को क्रिसमस

के कार्ड भेज दिए। उन्हें लगा था कि थोड़ा

बहुत जवाब आएगा। मगर जो हुआ वह हैरान कर

देने वाला था। उन लोगों की तरफ से कार्डों

की बाढ़ आ गई जिन्होंने प्रोफेसर का नाम

तक नहीं सुना था। ज्यादातर लोगों ने यह तक

नहीं पूछा कि यह भेजने वाला है कौन?

उन्हें कार्ड मिला बटन दबाओ और टेप छालो।

उन्होंने बिना सोचे समझे बदले में कार्ड

भेज दिया। यह छोटी सी बात हमारे बीच के

सबसे खतरनाक दिमाग के हथियार को दिखाती

है। इसे कहते हैं लेनदेन का चक्कर।

रेसिप्रोकेशन।

यह नियम कहता है कि अगर किसी ने हमारे लिए

कुछ किया है तो हमें भी उसके लिए कुछ करना

पड़ेगा। अगर किसी औरत ने आप पर कोई एहसान

किया तो आपको उसे चुकाना होगा। अगर किसी

ने आपको जन्मदिन का तोहफा दिया तो आपको भी

उसके जन्मदिन पर कुछ देना होगा। अगर किसी

ने आपको दावत पर बुलाया तो आपको भी उसे

बुलाना पड़ेगा।

इस नियम की वजह से हम पर एहसान का बोझ लग

जाता है। यह दुनिया की हर बस्ती और हर

समाज में फैला हुआ है।

पुराने जमाने के लोग कहते हैं कि हम इंसान

ही इसलिए बने क्योंकि हमारे पूर्वजों ने

खाना और हुनर आपस में बांटना सीखा।

उन्होंने एहसानों का एक जाल बुना जिसने

सबको एक दूसरे से जोड़ दिया।

एहसान का यह बोझ कितना लंबा खींच सकता है।

इसकी एक मिसाल देखिए।

1985 में 1985 में इथोपिया भुखमरी और

गरीबी से जूझ रहा था।

लोग हजारों की तादाद में मर रहे थे। उस

वक्त खबर आई कि इथियोपिया ने मेक्सिको को

$000 की मदद भेजी है।

इतने गरीब देश ने मदद क्यों भेजी?

पता चला कि 1935 में 1935 में जब इटली ने

इथियोपिया पर हमला किया था तब मेक्सिको ने

उनकी मदद की थी। 50 साल बीत गए। दूरी

हजारों मील की थी। देश में अकाल पड़ा था।

मगर यह रेसिप्रोकेशन यह लेनदेन का चक्कर

इतना मजबूत था कि उन्होंने अपना उधार

चुकाया।

अब देखिए कि दिमाग से खेलने वाले खिलाड़ी

इस नियम का फायदा कैसे उठाते हैं।

कॉर्नल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेनिस

रिगर ने एक प्रयोग किया। दो लोग मिलकर

पेंटिंग देख रहे थे। एक असली ग्राहक था और

दूसरा प्रोफेसर का चेला जो जो था। दो

तरीके अपनाए गए। पहला

जो थोड़ी देर के लिए बाहर गया और वापस आते

वक्त दो कोक की बोतल लाया। एक अपने लिए और

एक उस ग्राहक के लिए। उसने कहा मैंने अपने

लिए ली तो सोचा एक तुम्हारे लिए भी ले

लूं। दूसरा दूसरी बार वो खाली हाथ वापस

आया। बाद में जू ने उस ग्राहक से एक छोटी

सी बात पूछी।

मैं कार की लॉटरी की टिकटें बेच रहा हूं।

अगर मैं सबसे ज्यादा बेचूंगा तो मुझे $50

का इनाम मिलेगा। क्या तुम कुछ टिकटें

खरीदोगे? एक टिकट 25 पैसे की है। नतीजा

जिन लोगों को जो नेक पिलाई थी, उन्होंने

उन लोगों के मुकाबले दोगुनी टिकटें खरीदी

जिन्हें कुछ नहीं मिला था।

मजेदार बात यह है कि रीगन ने यह भी देखा

कि लोग जो को कितना पसंद करते हैं। आमतौर

पर हम उसी की बात मानते हैं जिसे हम पसंद

करते हैं। मगर जिन्हें कोख पिलाई गई थी

उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ा कि वह जो

को पसंद करते हैं या नहीं।

लेनदेन का चक्कर यानी रेसिप्रोकेशन इतना

भारी पड़ा कि पसंद नापसंद का नियम उसके

आगे फेल हो गया।

1970 के दशक में हरे कृष्णा समाज ने बहुत

पैसा और प्रॉपर्टी बनाई। पहले वह सड़कों

पर नाच गाकर चंदा मांगते थे। पर लोग

उन्हें अजीब समझते थे। फिर उन्होंने एक

मास्टर प्लान बनाया।

उन्होंने रेसिप्रोकेशन यानी लेनदेन का

चक्कर इस्तेमाल करना शुरू किया।

अब वह चंदा मांगने से पहले लोगों को एक

तोहफा देते। एक किताब या सिर्फ एक फूल।

अगर आप फूल वापस करना चाहे तो मना कर

देते। नहीं यह हमारी तरफ से आपके लिए

तोहफा है।

जब फूल आपके हाथ में आ गया तो आप पर एहसान

का बोझ लग गया। इसके बाद ही वह चंदा

मांगते थे। यह तरीका इतना कामयाब रहा कि

उन्होंने दुनिया भर में सैकड़ों केंद्र

खोल लिए।

मैंने खुद एयरपोर्ट पर देखा है कि लोग वह

फूल कूड़ेदान में फेंक देते हैं। मगर फिर

भी वह चंदा दे चुके होते हैं। फूल की कीमत

भले ही कचरे के बराबर हो पर उस तोहफे ने

उनके दिमाग का टेप चला दिया था।

बाजार में फ्री सैंपल का खेल तो आपने देखा

ही होगा। दुकानदार आपको पनीर का टुकड़ा

चखाता है या क्रीम लगाने को देता है। हमें

लगता है वह सिर्फ हमें चेक कर रहा है। मगर

असल में वह हमें बकरा बना रहा है। जब आप

उसका सामान चख लेते हैं तो आपको बिना कुछ

खरीदे वहां से जाने में शर्म आती है। आप

वह चीज खरीद लेते हैं। भले ही आपको उसकी

जरूरत ना हो।

एमवी जैसी कंपनियां भी यही करती हैं। वह

आपके घर सामान का एक बैग छोड़ जाती हैं।

कि दो-तीन दिन इस्तेमाल करके देखिए कोई

पैसा नहीं लगेगा। जब आप उसे इस्तेमाल कर

लेते हैं तो आप अनजाने में उनके जाल में

फंस जाते हैं और कुछ ना कुछ ऑर्डर दे ही

देते हैं।

इस नियम की सबसे बड़ी चालाक यह है कि

एहसान का बोझ लड़ने के लिए आपको हां कहना

जरूरी नहीं है। अगर किसी ने जबरदस्ती भी

आपको कुछ थमा दिया तो भी आपका दिमाग उसे

चुकाने की सोचने लगता है।

जैसे कुछ संस्थाएं चिट्ठी में अपने नाम के

स्टीकर या चाबी का छल्ला भेज देती हैं। वो

लिखती हैं। यह हमारी तरफ से छोटा सा तोहफा

[संगीत] है। अब आप उस छल्ले को इस्तेमाल

तो करना चाहते हैं [संगीत] पर बदले में

पैसे ना देने पर आपको बुरा लगता है। खेल

यहीं शुरू होता है। उन्होंने पहले आपको

तोहफा दिया। उनकी मर्जी और फिर आपसे पैसे

मांगे। यह भी उनकी मर्जी। आपके पास तो

चुनने का मौका ही नहीं बचा।

यह एक्सप्लइटर्स जानते हैं कि एहसान का

बोझ उतारने के लिए लोग अक्सर उसे कहीं

बड़ी चीज देने को तैयार हो जाते हैं।

एक 25 पैसे की कोख के बदले $5 की टिकटें

बिक जाती हैं। क्यों? क्योंकि हमें एहसान

फरामोश या मुफ्तखोर कहलाना पसंद नहीं है।

समाज ऐसे लोगों को बुरी नजर से देखता है।

इसलिए हम इस शर्म से बचने के लिए बड़ी से

बड़ी कीमत चुका देते हैं। यह एक्सप्लइटर्स

खुद कुछ नहीं करते। वह बस आपके अंदर छिपे

इस नियम के बटन को दबाते हैं और आपका टेप

खुद ब खुद चलने लगता है।

लेनदेन का चक्कर का यह नियम वैसे तो

बराबरी के लिए बना था।

पर चालाक खिलाड़ी यानी ऑपरेटर्स इसका

इस्तेमाल अपनी तिजोरी भरने के लिए करते

हैं।

नियम कहता है कि एहसान का बदला एहसान से

दो। मगर यह नहीं कहता कि एहसान बराबर का

होना चाहिए।

एक छोटा सा एहसान आपके ऊपर इतना भारी बोझ

डाल सकता है कि आप बदले में उसे कहीं बड़ी

चीज देने को तैयार हो जाते हैं।

मेरी एक स्टूडेंट की कहानी सुनिए। एक दिन

उसकी गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही थी। एक

लड़के ने आकर उसकी गाड़ी जंप स्टार्ट कर

दी। लड़की ने कहा, "बहुत शुक्रिया। एक

महीने बाद वही लड़का उसके घर आया और बोला

कि मेरी गाड़ी गैरेज में है। क्या

तुम्हारी गाड़ी 2 घंटे के लिए मिल सकती

है?

लड़के को थोड़ा अजीब लगा क्योंकि गाड़ी

नहीं थी और लड़का बहुत छोटा था। पर उसे

एहसान का बोझ महसूस हो रहा था। उसने चाबी

थमा दी। बाद में पता चला कि लड़के के पास

लाइसेंस भी नहीं था और उसने गाड़ी का कचरा

कर दिया।

सवाल यह है कि एक समझदार लड़की अपनी नई

गाड़ी किसी अनजान को क्यों दे देती है?

इसकी दो वजह हैं। पहला एहसान का बोझ। हम

इंसानों को किसी का कर्जदार रहना बिल्कुल

पसंद नहीं है। यह बोझ हमें चैन से बैठने

नहीं देता। हम इस बोझ को उतारने के लिए

कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। दूसरा

दुनिया की शर्म। समाज उन लोगों को पसंद

नहीं करता जो सिर्फ लेना जानते हैं। देना

नहीं। मुफ्तखोर या धोखेबाज का ठप्पा लगने

के डर से हम अक्सर घाटे का सौदा भी कर

लेते हैं।

बात मनवाने का एक और तरीका है जो सीधे

एहसान से भी ज्यादा खतरनाक है।

इसे मैं [संगीत] बड़ा मांगो फिर पीछे हटो।

रिजेक्शन देन रिट्रीट कहता हूं।

एक बार मैं सड़क पर जा रहा था। एक 11 साल

का लड़का आया। उसने कहा

साहब क्या आप शनिवार के सर्कस के लिए $5

का टिकट खरीदेंगे? मैंने मना कर दिया।

उसने तुरंत कहा अच्छा अगर टिकट नहीं चाहिए

तो आप हमारे बड़े चॉकलेट बार खरीदेंगे।

सिर्फ $1 का है। बताइए।

मैंने दो चॉकलेट खरीद ली। जबकि मुझे

चॉकलेट पसंद नहीं है और मुझे अपने डॉलर

प्यारे हैं।

यहां क्या हुआ? लेनदेन का चक्कर का दूसरा

नियम चला रेसिप्रोकेशन का। अगर कोई आपके

लिए अपनी मांग कम करता है कंसेशन तो आपके

दिमाग में घंटी बजती है कि मुझे भी इसकी

बात माननी चाहिए। उसने $5 से गिरकर $1 की

बात की। यानी उसने कदम पीछे हटाए।

मेरा बटन दबा और मेरा टेप चालू। मैंने भी

कदम पीछे हटाए और ना से हां पर आ गया।

यह तकनीक इतनी पावरफुल है कि इसने अमेरिका

के प्रेसिडेंट रिचर्ड निकन की कुर्सी छीन

ली। वाटर गेट स्कैम के वक्त उनके

सलाहकारों ने एक बहुत ही बेवकूफी भरा

प्लान पास कर दिया। ऑपोजिट पार्टी के

दफ्तर में चोरी करने का।

क्यों? क्योंकि मास्टरमाइंड लेडी ने पहले

$ लाख डॉलर का एक पागलपन भरा प्लान पेश

किया था जिसमें किडनैपिंग और जासूसी थी तो

वह मना हुआ तो उसने 5 लाख का प्लान दिया।

जब वह भी मना हुआ तो उसने ढाई लाख वाला

छोटा प्लान दिया। सलाहकारों को लगा कि

बेचारा इतनी बार अपनी मांग कम कर चुका है।

अब तो इसकी बात मान लेनी चाहिए।

अगर वह सीधे छोरी वाला प्लान लाता तो उसे

लात मारकर बाहर निकाल दिया जाता। पर फर्क

का खेल जो कंट्रास्ट प्रिंसिपल की वजह से

10 लाख के सामने [संगीत] ढाई लाख छोटा

लगा।

दुकानदार इस खेल के माहिर होते हैं। अगर

आप बिलियर टेबल खरीदने जाएं तो समझदार

दुकानदार आपको सबसे पहले 3000 डॉलर वाली

मेज दिखाएगा।

आप मना करेंगे तो वह धीरे-धीरे कम कीमत

वाली मेजों पर आएगा।

एक खोज से पता चला कि जब दुकानदार ने पहले

सस्ती मेज दिखाई [संगीत] तो एवरेज बिक्री

$50 की हुई। पर जब उसने सबसे पहले महंगी

मेज दिखाई और फिर नीचे आया तो एवरेज

बिक्री एवरेज सेल्स $1000 से ऊपर पहुंच

गई।

सबसे अजीब बात तो यह है कि जब कोई खिलाड़ी

अपनी मांग कम करता है और आप उसकी बात मान

लेते हैं तो आपको बुरा नहीं लगता बल्कि

जिम्मेदारी महसूस होती है। आपको लगता है

कि आपने मूल भाव करके उसे झुका दिया।

आपको लगता है कि सौदा आपने तय किया है और

दूसरा तसल्ली मिलती है क्योंकि आपको लगता

है कि आपने जीत हासिल की है इसलिए आप उस

वादे को पूरा भी करते हैं और अगली बार भी

उस दुकानदार के पास जाते हैं।

यह खिलाड़ी की सबसे बड़ी जीत है। उसने

आपकी जेब भी काट ली और आपने उससे शुक्रिया

भी कहा।

जब आपके सामने कोई ऑपरेटर कोई ऐसा खिलाड़ी

खड़ा हो जो लेनदेन के चक्कर का इस्तेमाल

कर रहा हो [संगीत] तो समझ लीजिए कि आपका

पाला एक बहुत ही शातिर दुश्मन से पड़ा है।

चाहे वह आपको कोई तोहफा दे या अपनी किसी

बात से पीछे हटने का नाटक करे। उसने असल

में आपकी हां निकलवाने के लिए एक बहुत

बड़ा जाल बिछाया है।

पहली नजर में तो ऐसा लगता है कि आपके पास

कोई रास्ता ही नहीं है। या तो उसकी बात

मान लीजिए और लेनदेन का चक्कर के आगे

घुटने टेक दीजिए या फिर मना करके एहसान

फरामोश होने की शर्मिंदगीगी झेलिए।

यानी या तो हार मान लीजिए या फिर बेइज्जती

सहिए।

दोनों ही रास्तों में आपका ही नुकसान है।

मगर खुशकिस्मती से यह दो ही रास्ते नहीं

है। अगर आप अपने दुश्मन की चाल समझ लें तो

आप इस दिमाग की कुश्ती के मैदान में बिना

किसी खरोच के बाहर निकल सकते हैं।

आपको बस यह समझना है कि आपका असली दुश्मन

वह खिलाड़ी नहीं है जो आपसे अपनी बात

मनवाना चाहता है। असली दुश्मन तो यह नियम

है।

अगर हम इस नियम को बेकार करना सीख जाए तो

हमारा काम बन जाएगा।

मगर इस नियम को बेकार कैसे करें? यह तो हर

जगह फैला हुआ है। क्या हम किसी के भी

तोहफे या मदद को लेना ही बंद कर दें? शायद

नहीं। क्योंकि अगर हम किसी को शक की नजर

से देखेंगे और हर मदद को ठुकरा देंगे तो

हम उन अच्छे लोगों का दिल दुखाएंगे जो सच

में हमारी मदद करना चाहते हैं।

मेरे एक साथी की बेटी के साथ ऐसा ही हुआ।

स्कूल में बच्चों ने अपने दादा-दादी के

लिए एक खास प्रोग्राम रखा था। उस 10 साल

की बच्ची का काम था आने वाले हर इंसान को

एक फूल देना। मगर जैसे ही वह एक आदमी के

पास फूल लेकर गई, वह उस पर चिल्लाया, अपने

पास रखो इसे। उसे लगा कि यह बच्ची उसे

किसी जाल में फंसा रही है। वह बच्ची इतना

डर गई कि उसे प्रोग्राम से ही हटाना पड़ा।

तो

सबक यह है कि हर किसी को ठुकराना सही

तरीका नहीं है। इससे आप दुनिया से कट

जाएंगे।

असली समाधान क्या है? इसका हल यह है कि आप

दूसरों के तोहफे को स्वीकार तो कर लें पर

उन्हें उनके असली रूप में देखें। अगर कोई

आपको सच में कोई मदद दे रहा है तो उसे लें

और यह बात मान लें कि आप भविष्य में उसे

कभी चुकाएंगे। यह कोई ठगी नहीं है। यह तो

इंसानी समाज का पुराना लेनदेन है। मगर अगर

वह तोहफा सिर्फ इसलिए दिया गया है ताकि

आपसे बाद में कोई बड़ी चीज वसूली जा सके

तो कहानी बदल जाती है। यहां वह इंसान

मददगार नहीं बल्कि मुनाफाखोर है। और यही

आपको अपना दांव चलना है।

जैसे ही आपको लगे कि यह तोहफा नहीं बल्कि

बात मनवाने की एक चाल है तो आप तुरंत अपने

दिमाग में उस चीज की डेफिनेशन बदल दें।

जैसे ही आप उसे तोहफा कहना बंद करके

सेल्स का तरीका कहेंगे। बिक्री का पैतरा

कहेंगे। लेनदेन का चक्कर का नियम यह

रेसिप्रोकेशन का रूल आप पर से अपना असर खो

देगा। नियम यह कहता है कि तोहफे के बदले

तोहफा दो। यह नहीं कहता कि चालाकी के बदले

तोहफा दो।

मान लीजिए किसी फायर सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन

की कोई औरत आपको फोन [संगीत] करती है। वह

कहती है कि वह आपके घर आकर आग से बचाव की

जांच करेगी और आपको एक फ्री आग बुझाने

वाला सिलेंडर देगी। आप मान जाते हैं। जांच

करने के बाद वह आदमी आपको सिलेंडर देता है

और डरावनी बातें बताता है कि आपके घर में

कितनी जल्दी आग लग सकती है। फिर वह आपको

500 का एक फायर अलार्म सिस्टम बेचने की

कोशिश करता है।

यहीं पर आपको खेल समझना है। अगर आप उस

सिलेंडर को तोहफा मानेंगे तो आप अलार्म

खरीदने का दबाव महसूस करेंगे। मगर आप अपने

दिमाग को बताइए कि यह सिलेंडर तोहफा नहीं

है। यह तो मुझे सामान बेचने का एक तरीका

है।

जैसे ही आपने यह सोचा आप आजाद हो गए। अब

आप चाहे तो अलार्म खरीदें या ना खरीदें।

आपको कोई बोझ महसूस नहीं होगा।

और यहां एक और मजेदार बात है। आप चाहे तो

उसी का हथियार उसी पर चला सकते हैं। नियम

कहता है कि जैसा कोई आपके साथ करे वैसा ही

आप उसके साथ करें। अगर उस इंस्पेक्टर ने

अपनी चालाकी का इस्तेमाल करके आपको फ्री

सिलेंडर दिया है तो आप भी चालाकी दिखाएं।

उसका सिलेंडर रखें। उसे प्यार से शुक्रिया

कहें और उसे दरवाजे तक छोड़ आए।

आखिर नियम तो यही है कि चालाकी करने वाले

के साथ वैसी ही चालाकी होनी चाहिए।

मैं काफी समय तक एक बड़ी दुकान में टीवी

और स्टीरियो बेचता था।

यह एक पुराने सेल्समैन की कहानी है।

वहां हमारी नौकरी इस बात पर टिकी होती थी

कि हम कितने सर्विस कॉन्ट्रैक्ट बेचते

[संगीत] हैं, कितनी वारंटी बेचते हैं। अगर

हम कम वारंटी बेचते तो हमें नौकरी से

निकालने की धमकी दी जाती थी। तब मैंने

बड़ा मांगो फिर पीछे हटो का इस्तेमाल शुरू

किया। रिजेक्शन देन रिट्रीट।

मैं ग्राहकों को सबसे पहले 3 साल वाली

सबसे महंगी वारंटी लेने को कहता।

मुझे पता था कि ज्यादातर लोग इतने पैसे

नहीं देंगे। जैसे ही ग्राहक मना करता मैं

अपना कदम पीछे खींचता और कहता अच्छा तो कम

से कम एक साल वाली सस्ती वारंटी ही ले

लीजिए। यह तरीका गजब का काम कर गया।

ग्राहक को लगता है कि मैंने उसके लिए दाम

कम कर दिया। कंसेस और वह खुशीखुशी हां बोल

देता। मेरी बिक्री मेरे साथियों से कहीं

ज्यादा थी और ग्राहक भी बहुत खुश रहते थे।

गौर कीजिए कि कैसे यहां फर्क का खेल भी

काम कर रहा है। बड़ी कीमत के सामने छोटी

कीमत छोटी लगती है। जिससे ग्राहक को लगता

है कि उसे एक बेहतरीन सौदा मिला है। यानी

बटन दबा और टेप चालू।

चैप्टर तीन

कमिटमेंट एंड कंसिस्टेंसी।

कनाडा के कुछ जानकारों ने घोड़दौड़ के

मैदान में एक बड़ी मजेदार चीज देखी। जब

लोग घोड़े पर दांव लगाते हैं तो टिकट

खरीदने के ठीक बाद उन्हें अपने घोड़े के

जीतने का भरोसा [संगीत] अचानक बढ़ जाता

है। जबकि घोड़े की काबिलियत में एक रत्ती

भर का भी फर्क नहीं आया। घोड़ा वही है,

मैदान वही है और बाकी दौड़ने वाले भी वही

हैं। मगर जैसे ही जेब से पैसे निकले और

हाथ में टिकट आई उनके दिमाग में उस घोड़े

की किस्मत चमक गई। ऐसा क्यों होता है?

इसके पीछे दिमाग के खेल का एक बहुत बड़ा

हथियार है। हम सबके अंदर एक सनक होती है।

जबान का पक्का होने की कमिटमेंट एंड

कंसिस्टेंसी की। यानी जो हमने एक बार कह

दिया या कर दिया हम उसी पर अड़े रहना

चाहते हैं।

एक बार जब हम कोई फैसला ले लेते हैं तो

हमारे अंदर से और बाहर की दुनिया से एक

दबाव आता है कि हम उसी फैसले के मुताबिक

काम करें।

हम बस खुद को यह यकीन दिलाने में जुट जाते

हैं कि हमने जो किया वह बिल्कुल सही था।

मेरी पड़ोसन सारा और उसके बॉयफ्रेंड टीम

की कहानी देखिए। टीम बहुत शराब पीता था और

सारा से शादी करने को तैयार नहीं था। तंग

आकर सारा ने उसे घर से निकाल दिया। उसी

वक्त सारा का एक पुराना प्रेमी वापस आया

और दोनों की शादी पक्की हो गई। तारीख तय

हो गई और कार्ड भी बट गए। तभी टीम वापस

आया और गिड़गिड़ाने लगा कि वह शराब छोड़

देगा। और शादी भी कर लेगा। सारा ने अपनी

सगाई तोड़ दी और टीम को वापस बुला लिया।

एक महीने बाद टीम ने कहा कि उसे शराब

छोड़ने की जरूरत नहीं है। और दूसरे महीने

कहा कि शादी के बारे में बाद में देखेंगे।

दो साल बीत गए। टीम अभी पीता है और शादी

का कोई नाम नहीं है।

लेकिन सारा अब टीम के लिए पहले से कहीं

ज्यादा पागल है। वह कहती है कि उसने टीम

को चुनकर यह जान लिया कि टीम ही उसका असली

प्यार है।

सच तो यह है कि सारा बस अपने उस फैसले को

सही साबित करने में लगी है जो टीम को वापस

बुलाने का था।

हम सब कभी ना कभी खुद को बेवकूफ बनाते

हैं। ताकि हमारी सोच हमारे पिछले कामों के

साथ मेल खाती रहे।

एक और सबूत देखिए। न्यूयॉर्क के एक बीच पर

एक प्रयोग किया गया। एक खिलाड़ी ने अपना

रेडियो कंबल पर रखा और थोड़ी देर बाद

टहलने चला गया।

फिर दूसरा खिलाड़ी चोर बनकर आया और रेडियो

लेकर भागने लगा। आमतौर पर 20 में से सिर्फ

पांच लोगों ने उसे रोकने की हिम्मत की।

मगर जब खेल को थोड़ा बदला गया तो नतीजा

देखकर आप हैरान रह जाएंगे। इस बार टहलने

जाने से पहले खिलाड़ी ने बगल वाले इंसान

से बस इतना कहा जरा मेरे सामान का ध्यान

रखिएगा। सब ने कहा हां जरूर।

अब जैसे ही चोर आया। 20 में से 19 लोग

किसी कमांडो की तरह उसके पीछे भागे। उसे

पकड़ा और रेडियो वापस छीन लिया। सिर्फ एक

छोटे से वादे ने उन्हें अपनी जान जोखिम

में डालने पर मजबूर कर दिया। क्यों?

क्योंकि उन्होंने हां बोला था और उन्हें

जबान का पक्का साबित होना था।

हम जबान के पक्के होने के इतने आदि क्यों

हैं? क्योंकि असल दुनिया में वादे का

पक्का होना अच्छी बात मानी जाती है। जो

अपनी बात से पलट जाए उसे दुनिया दुगला या

कमजोर कहती है।

मगर यही खूबी कभी-कभी मुसीबत बन जाती है।

इसके दो बड़े फायदे हैं। पहला दिमाग का

शॉर्टकट कि एक बार फैसला ले लिया तो फिर

से सोचने की मेहनत बच जाती है। रोज हजारों

जानकारियों के बीच दिमाग खपाने से अच्छा

है कि अपना पूरा टेप चालू कर दीजिए और वही

करिए जो पहले किया था।

दूसरा कभी-कभी गहराई से सोचने पर ऐसे जवाब

मिलते हैं जो हमें डरा देते हैं। इसलिए हम

जबान का पक्का होने की दीवार के पीछे छिप

जाते हैं ताकि अकल की बात हम तक ना पहुंच

सके।

एक बार मैं एक मेडिटेशन सिखाने वाली

मीटिंग में गया। वहां सिखाने वाले

बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे कि वह दीवारों

के आरपार जाना सिखा देंगे। मेरा एक दोस्त

जो बहुत बड़ा तर्क करने वाला था। उसने

खड़े होकर उनके सारे दावों की धज्जियां

उड़ा दी। उसने दो मिनट में साबित कर दिया

कि उनकी सारी बातें बकवास है। सिखाने वाले

हक्का बक्का हो गए।

मगर असली तमाशा उसके बाद हुआ। जैसे ही

मीटिंग खत्म हुई, लोग पागलों की तरफ पैसे

देने के लिए टूट पड़े। [संगीत] क्यों?

क्योंकि वह लोग परेशान थे और अपनी

समस्याओं का हल चाहते थे। मेरे दोस्त के

तर्क ने उनकी उम्मीद छीन ली थी। अब इससे

पहले कि उनका दिमाग उस कड़वे सच को मान

ले। उन्होंने फटाफट पैसे जमा कर दिए ताकि

उनका फैसला पक्का हो जाए।

अब वह घर जाकर चैन से सोच सकते हैं

क्योंकि मैंने पैसे दे दिए हैं तो अब यह

तरीका काम करेगा ही।

खिलौने बनाने वाली कंपनियां साल भर मोटा

पैसा कमाती हैं। पर जनवरी फरवरी में उनकी

ग्रोथ गिर जाती है। इसका हल उन्होंने

निकाला जा के पक्का होने वाले हथियार से।

पहला वह क्रिसमस से पहले टीवी पर एक बहुत

ही शानदार खिलौने का विज्ञापन दिखाते हैं।

बच्चे उसे देखते हैं और अपने मां-बाप से

उसे दिलाने का वादा ले लेते हैं। दूसरा

कंपनियां जानबूझकर उस खास खिलौने की

सप्लाई दुकानों में कम कर देती हैं।

तीसरा जब बाप दुकान पर जाता है तो उसे पता

चलता है कि वह खिलौना तो खत्म हो गया है।

और मजबूरी में वह बच्चे को कोई दूसरा उतना

ही महंगा खिलौना दिला देता है।

कंपनियां इन दूसरे खिलौनों का स्टॉक भरभर

के रखती हैं।

चौथा क्रिसमस के बाद कंपनियां फिर से उसी

खास खिलौने का विज्ञापन चलाने लगती हैं।

बच्चा फिर से जिद करता है। पापा आपने वादा

किया था।

पांचवा बेचारा बाप अपना वादा निभाने के

लिए फिर से दुकान जाता है और वही खिलौना

फिर से खरीदता है।

इस तरह कंपनियों ने आपसे एक के बजाय दो

महंगे खिलौने बिकवा दिए और आपने खुशी-खुशी

पैसे दिए क्योंकि आपको अपना वादा निभाना

था।

जबान के पक्के होने का सबसे असरदार तरीका

है लिखना।

चीन के झेलों में अमेरिकी फौजियों को

बदलने के लिए यही किया गया। उनसे सीधे देश

के खिलाफ कुछ नहीं लिखवाया गया। शुरुआत

छोटी की गई। अमेरिका परफेक्ट नहीं है।

लिखो। चलो अमेरिका में क्या-क्या कमियां

है उसकी एक लिस्ट बनाओ और नीचे अपने साइन

करो। अब इसे दूसरे कैदियों के सामने पढ़कर

सुनाओ।

जैसे ही उन फौजियों ने अपने हाथों से वह

बातें लिखी, उनके दिमाग की फोटो बदल गई।

उन्हें लगा अगर मैंने यह लिखा है, तो शायद

मैं यही मानता हूं।

अमवे जैसी कंपनियां भी अपने सेल्स वालों

से कहती हैं, अपना लक्ष्य कागज पर लिखो

अपना टारगेट।

जब आप कुछ लिख देते हैं, तो वह एक सबूत बन

जाता है जिसे आप झुठला नहीं सकते।

बड़ी-बड़ी कंपनियां जो मुझे यह साबुन

क्यों पसंद है? ऐसे एसएस लिखवाती हैं, वह

भी इसी खेल का हिस्सा है। जब आप इनाम के

लालच में उस चीज की तारीफ लिख देते हैं,

तो आपका दिमाग धीरे-धीरे सच में उस पर

यकीन करने लगता है।

अगली बार जब कोई आपसे छोटा सा वादा ले या

कुछ लिखवाए, तो सावधान हो जाइए। वह सिर्फ

एक हां नहीं ले रहा। वह आपकी जुबान की

पक्की वाली आदत का फायदा उठाकर आपका पूरा

हाथ पकड़ने की तैयारी कर रहा है।

लिखकर दी गई बात इसलिए असरदार होती है

क्योंकि उसे दुनिया के सामने बड़ी आसानी

से पेश किया जा सकता है। चीन के

खिलाड़ियों को यह पता था कि दुनिया के

सामने किया गया वादा सबसे पक्का वादा होता

है। वे कैदियों से लिखवाते और फिर उसे

पूरे कैंप में चिपका देते या रेडियो पर

पढ़वा देते थे। जितना पब्लिक होगा उतना ही

आदमी अपनी बात पर अड़ा रहेगा। क्यों? जब

आप दुनिया के सामने कोई स्टैंड ले लेते

हैं तो आपके अंदर एक दबाव पैदा होता है कि

आप अपनी बात के जबान के पक्के बने रहे

ताकि लोग आपको भरोसेमंद और समझदार समझे।

जो अपनी बात से पलट जाए उसे दुनिया बिना

पेंदी का लोटा या कमजोर दिमाग वाला कहती

है। इसीलिए दुनिया के सामने हम अपनी बात

बदलने से कतराते हैं। यह सेल्समैनों का भी

सबसे पुराना और गंदा खेल है। मान लीजिए आप

कार खरीदने गए। सेल्समैन ने आपको

ऐसी कीमत बताई जो बाजार से 300 कम है। आप

खुश हो गए और खरीदने का फैसला कर लिया। अब

आप फॉर्म भरते हैं, टेस्ट ड्राइव लेते

हैं, घर वालों को फोन कर देते हैं। यानी

आप जबान के पक्के होने के जाल में फंस

चुके हैं। तभी सेल्समैन आता है और कहता

है, माफ करना भाई, मैनेजर ने मना कर दिया

या गलती से एसी की कीमत जोड़ना भूल गए। अब

कार बाजार के भाव पर ही मिल रही है। आप

क्या करेंगे? ज्यादातर लोग फिर भी कार

खरीद लेते हैं क्योंकि अब तक आपने अपने

दिमाग में उस कार को खरीदने के 10 नए कारण

पैदा कर लिए हैं।

वह 300 की छूट तो सिर्फ एक लालच थी। अब जब

वह हट भी गया तब भी आपका फैसला अपनी नई

पैदा की गई दलीलों पर खड़ा है।

जब कोई आपको अपनी बातों में फंसाकर हां

बुलवाने की कोशिश करे तो आपका शरीर आपको

दो तरह के सिग्नल देता है। स्टमक साइंस जब

आपको लगे यानी पेट की मरोड़ जब आपको लगे

कि आपकी ही बातों का इस्तेमाल करके आपको

फंसाया जा रहा है तो आपके पेट में एक अजीब

सी हलचल होगी।

यह आपका दिमाग कह रहा है कि आपका नुकसान

हो रहा है।

इसका इलाज यह है कि उस आदमी को साफ कह दें

कि आप क्या कर रहे हैं। उससे कहिए कि मैं

आपकी बात सिर्फ इसलिए नहीं मानूंगा

क्योंकि मैंने पहले कुछ कह दिया था। मुझे

आपकी चालाकी समझ आ गई है।

दूसरा दिल की आवाज। कभी-कभी पेट में मरोड़

नहीं होती क्योंकि हम खुद को यकीन दिला

चुके होते हैं कि हमारा फैसला सही है। तब

खुद से एक सवाल पूछिए। आज तो मुझे पता है

अगर मैं वक्त में पीछे जा सकूं तो क्या

मैं फिर से यही फैसला लूंगा? जो पहली झलक

या एहसास आपके दिमाग में आए उस पर यकीन

करें। अगर वह एहसास ना कहे तो समझ लीजिए

कि आप जबान की पक्की वाली बेवकूफी कर रहे

हैं। दिमाग की नींद से जागिए। जबान का

पक्का होना अच्छी बात है। पर बेवकूफी भरी

वफादारी आपको सिर्फ नुकसान पहुंचाएगी।

चैप्टर चार सोशल प्रूफ।

जब सब एक जैसा सोच रहे होते हैं तो समझ

लीजिए कि कोई भी ज्यादा दिमाग नहीं लगा

रहा है। ऐसा वाल्टर लिपमैन ने कहा था।

सोशल प्रूफ या जिसे हम भेड़ चाल भी कह सकते

हैं। यानी सब कर रहे हैं तो सही होगा।

क्या आपको टीवी शोज़ में बजने वाली वह नकली

हंसी या रिकॉर्डेड टेप पसंद है? मैंने

जितने भी लोगों से पूछा चाहे वह पढ़ा लिखा

प्रोफेसर हो या दफ्तर का चपरासी

सबको इससे चिढ़ है। लोग इसे नकली घटिया और

बेवकूफी भरा मानते हैं।

तो फिर टीवी चलाने वाले बड़े-बड़े अफसर

इसे हर कॉमेडी शो में क्यों डालते हैं?

क्या वे बेवकूफ हैं? नहीं। वह ऑपरेटर्स

हैं, खिलाड़ी हैं। उन्हें एक बहुत गहरा

राज पता है। खोज से पता चला है कि अगर शो

में नकली हंसी बजती है तो लोग ज्यादा देर

तक और ज्यादा बार हंसते हैं। उन्हें घटिया

जोक भी बढ़िया लगने लगते हैं।

तो खेल यह है कि जब कंटेंट या जब माल खराब

हो तो नकली हंसी का बटन दबा और टेप चालू

कर रहे हैं। हम जानते हैं कि वह हंसी नकली

है। फिर भी हमारा दिमाग उसे सच मानकर

रिएक्शन देने लगता है। ऐसा क्यों होता है?

क्योंकि यहां दिमाग के खेल का एक बहुत

बड़ा हथियार काम कर रहा है। सोशल प्रूफ

यानी भेड़चाल।

यह नियम कहता है कि क्या सही है और क्या

गलत। यह तय करने के लिए हम देखते हैं कि

बाकी लोग क्या कर रहे हैं। अगर फिल्म के

दौरान सब लोग पॉपकॉर्न का डिब्बा नीचे

छोड़ रहे हैं या सब लोग सड़क पर एक खास

रफ्तार से गाड़ी चला रहे हैं तो हम भी वही

करते हैं। हमें लगता है कि अगर इतने सारे

लोग ऐसा कर रहे हैं तो यही सही तरीका

होगा।

ज्यादातर समय यह नियम हमारे काम आता है।

मगर इसी शॉर्टकट की वजह से हम खिलाड़ियों

यानी ऑपरेटर्स का भोले शिकार बन जाते हैं।

टीवी वाले हमारी इसी दिमाग की नींद का

फायदा उठाते हैं। जैसे टर्की मां सिर्फ

चीची सुनकर दुश्मन नेवले को भी पालने लगती

है। वैसे ही हम हाहा की आवाज सुनकर जोक पर

हंसने लगते हैं। रिकॉर्डेड आवाज हमारे

दिमाग का बटन दबा देती है। टीवी वाले

अकेले नहीं है। बार टेंडर [संगीत] वो अपने

टिप वाले मटकी में पहले से कुछ नोट डाल

देते हैं ताकि आपको लगे कि सब लोग नोट दे

रहे हैं तो आपको भी देने चाहिए। दूसरा

विज्ञापनी यानी वह आपको बताते हैं कि यह

सामान सबसे ज्यादा बिकने वाला है। उन्हें

यह साबित करने की जरूरत नहीं कि सामान

अच्छा है। बस यह बोल देना काफी है कि सब

इसे खरीद रहे हैं। तीसरा क्लब वाले बाहर

लंबी लाइन लगवा देते हैं। जबकि अंदर जगह

खाली होती है। सिर्फ यह दिखाने के लिए कि

यहां घुसने के लिए दुनिया मरी जा रही है।

यह भेड़छाल का नियम तब सबसे ज्यादा असर

करता है जब हम उलझन में होते हैं

अनसर्टेनिटी में। जब हमें समझ नहीं आता कि

क्या करना है तो हम दूसरों का मुंह ताकने

लगते हैं। मगर यही एक बड़ा धोखा हो जाता

है जिसे कहते हैं सबका एक दूसरे का मुंह

ताकना।

जब कोई मुसीबत आती है तो हर कोई यह देखने

के लिए दूसरों की तरफ देखता है कि वह क्या

कर रहे हैं। और क्योंकि हर कोई शांत दिखने

की कोशिश कर रहा होता है तो सबको लगता है

कि शायद कोई खतरा नहीं है। तभी तो सब शांत

हैं।

इसका सबसे दुखद उदाहरण

19 [संगीत] 65 में न्यूयॉर्क की कैथरीन

जेनोविच का केस है। 35 मिनट तक एक हत्यारा

उन्हें सड़क पर मारता रहा। वह चिल्लाती

रही। मगर उनके 38 पड़ोसियों ने खिड़की से

तमाशा देखा और किसी ने पुलिस को फोन तक

नहीं किया।

लोग कहने लगे कि शहर के लोग पत्थर दिल हो

गए हैं। मगर असलियत यह थी कि वहां 38 लोग

मौजूद थे। हर किसी को लगा कि कोई और मदद

कर देगा या क्योंकि बाकी लोग खिड़की से

देख रहे हैं और कुछ कर नहीं रहे तो शायद

यह कोई मामूली मियां बीवी का झगड़ा होगा।

भेड़चाल की वजह से सब ने खतरे को मामूली

समझ लिया।

एक्सपेरिमेंट से पता चला कि अगर आप अकेले

हैं और किसी को दौरा पड़ता है तो 85% लोग

मदद करते हैं। मगर अगर पांच लोग खड़े हैं

तो सिर्फ 31% लोग ही आगे आते हैं। समस्या

यह नहीं कि लोग बुरे हैं। समस्या यह है कि

भीड़ में जिम्मेदारी बंट जाती है और हर

कोई एक दूसरे का मुंह ताकने लगता है। अगर

आप कभी किसी मुसीबत में फंस जाए जैसे आपको

दिल का दौरा पड़ रहा हो या कोई आप पर हमला

कर रहा हो तो भीड़ को पुकारने की गलती मत

कीजिए। कोई मदद करो। चिल्लाने से लोग उलझन

में पड़ जाएंगे कि उन्हें क्या करना है।

सही तरीका यह है कि भीड़ में से एक इंसान

को चुनिए। उसे उंगली से इशारा कीजिए और

सीधे हुक्म दीजिए। आप

नीली कमीश वाले भाई साहब हां आप ही मुझे

दिल का दौरा पड़ रहा है। एंबुलेंस बुलाइए।

जैसे ही आपने उस एक इंसान को चुना उसकी

उलझन खत्म हो गई। उसे पता चल गया कि यह

इमरजेंसी है। दूसरा उसकी जिम्मेदारी तय हो

गई। अब उसे पता है कि मदद उसे ही करनी है।

और तीसरा उसे सबूत मिल गया है कि उसे क्या

करना है।

जब वह एक इंसान आपकी मदद के लिए आगे

बढ़ेगा तो बाकी भीड़ भीड़चाल के नियम के

तहत उसकी नकल करने लगेगी और सब आपकी मदद

में जुट जाएंगे।

भेड़चाल का इस्तेमाल हम खुद को यकीन दिलाने

के लिए भी करते हैं। 1950 के दशक में

शिकागो में एक ग्रुप था जिसे लगता था कि

21 दिसंबर को दुनिया खत्म हो जाएगी और

उड़न तश्तरी आकर उन्हें बचा लेगी।

उन्होंने अपनी नौकरियां छोड़ दी। पैसा

लुटा दिया और दुनिया से नाता तोड़ लिया।

21 दिसंबर की रात आई। सब इंतजार करते रहे।

मगर ना कोई बाढ़ आई ना कोई एलियन।

उनकी पूरी मान्यता मिट्टी में मिल गई।

हैरानी की बात यह है कि दुखी होने या

ग्रुप छोड़ने के बजाय वह लोग अगले ही दिन

सड़कों पर उतर आए और पागलों की तरह लोगों

को अपने ग्रुप में शामिल करने लगे। क्यों?

क्योंकि उन्हें सोशल प्रूफ चाहिए था।

उन्हें लगा कि अगर वह और ज्यादा लोगों को

यकीन दिला सके कि उनका रास्ता सही है तो

शायद उनका अपना शक भी खत्म हो जाएगा।

अगर बहुत सारे लोग इसे मान लेंगे तो यह सच

ही हो जाएगा। यह दिमाग का सबसे बड़ा स्कैम

है।

भेड़ा एक खतरनाक हथियार है। चाहे वह

विज्ञापन हो, चंदा मांगने वाले हो या फिर

सड़क पर होने वाला कोई हादसा।

हमारा दिमाग हमेशा दूसरों की नकल करना

चाहता है। अगली बार जब आप किसी चीज को

सिर्फ इसलिए नहीं माने क्योंकि बाकी सभी

ऐसा ही कर रहे हैं तो रुकिए। अपने दिमाग

का बटन खुद संभालिए वरना कोई और उसे दबाकर

अपना टेप चला देगा।

अभी हमने देखा कि भेड़चाल का हथियार तब काम

करता है जब हम उलझन [संगीत] में होते हैं।

मगर इसका एक और बड़ा राज है बराबरी।

यह नियम तब सबसे ज्यादा आग लगाता है जब हम

अपने जैसे लोगों को कुछ करते देखते हैं।

हमें लगता है कि अगर मेरे जैसा इंसान यह

कर रहा है तो मेरे लिए भी यही सही है।

यही वजह है कि टीवी पर आजकल आम आदमी

विज्ञापनों में चीख-चीख कर सामान की तारीफ

करता है। विज्ञापन बनाने वाले खिलाड़ी यह

ऑपरेटर से जानते हैं कि अगर आपको साबुन

बेचना है तो किसी बड़े स्टार के बजाय आपके

पड़ोस वाली शीला या रामू को दिखाना ज्यादा

असरदार है।

चैप्टर पांच

लाइकिंग पसंद नापसंद

यह कोई नई बात नहीं है कि हम उन लोगों को

हां बोलना पसंद करते हैं जिन्हें हम जानते

हैं या जो हमें अच्छे लगते हैं। मगर

चौंकाने वाली बात यह है कि इसी सीधी सी

बात का इस्तेमाल करके अजनबी लोग हमसे अपनी

बात मनवा लेते हैं।

इसका सबसे अच्छा एग्जांपल है टॉपरवेयर

पार्टी।

यहां दिमाग के खेल के सारे हथियार एक साथ

चलते हैं। [संगीत] लेनदेन का चक्कर,

पार्टी शुरू होते ही सबको छोटे-छोटे इनाम

या गिफ्ट दिए जाते हैं। फिर जबान का पक्का

होना यानी कमिटमेंट। हर किसी से सबके

सामने कहलवाया जाता है कि उन्हें यह

डिब्बा क्यों पसंद है। फिर भेड़छाल यानी

सोशल प्रूफ। जब दूसरे लोग खरीदते हैं तो

आपको लगता है कि सामान वाकई अच्छा [संगीत]

होगा।

मगर इस पार्टी की असली ताकत है पसंद

नापसंद का नियम, लाइकिंग का नियम। यहां

सामान बेचने वाला कोई अजनबी नहीं बल्कि

आपकी अपनी सहेली होती है। कंपनी को पता है

कि आप अजनबी सेल्समैन को मना कर सकते हैं

पर अपनी सहेली को नहीं। रिसर्च कहती है कि

सामान की जरूरत से दो गुना असर इस बात का

होता है कि आप उस सहेली को कितना पसंद

करते हैं।

कुछ ऑपरेटर्स तो आपके दोस्त को साथ भी

नहीं लाते। बस उसका नाम ही काफी होता है।

वे आपसे पूछते हैं क्या आप अपने किसी

दोस्त का नाम बता सकते हैं जिसे इस सामान

की जरूरत है। फिर वे आपके दोस्त के पास

जाकर कहते हैं आपके दोस्त फलाने जी ने

मुझे आपके पास भेजा है। अब उसे मना करना

मतलब अपने दोस्त को मना करना है। 50% सेल

तो दरवाजे के अंदर घुसने से पहले ही पक्की

हो जाती है।

डेट्रॉयड का एक आदमी था जोगीराट

उसने शिवरले कारें बेचकर करोड़ों कमाए।

उसका नुस्खा बहुत सीधा था। सही दाम प्लस

वह आदमी जिसे ग्राहक पसंद करें। वह हर

महीने अपने 13,000 पुराने ग्राहकों को एक

कार्ड भेजता था। उस पर बस इतना लिखा होता

था। मैं तुम्हें पसंद करता हूं। आई लव यू।

आप सोचेंगे कि 13,000 13,000 लोगों को छपा

हुआ कार्ड भेजने से क्या होगा? जो जानता

था कि हम सब फ्लैटरी के भूखे हैं। रिसर्च

कहती है कि भले ही तारीफ झूठी हो, हमारा

दिमाग उसे सच मानकर उस आदमी को पसंद करने

लगता है। यानी बटन दबाओ और टेप चालू।

हमें लोग क्यों पसंद आते हैं?

पहला है फिजिकल अट्रैक्टिवनेस। सुंदरता का

जादू। खूबसूरत लोगों को एक खास फायदा

मिलता है जिसे हेलो इफेक्ट कहते हैं। हमें

लगता है कि अगर कोई दिखने में अच्छा है तो

वह दयालु, ईमानदार और अकलमंद भी होगा।

कनाडा के चुनाव में देखा गया कि सुंदर

उम्मीदवारों को बदसूरत उम्मीदवारों के

मुकाबले ढाई गुना ज्यादा वोट मिले।

अदालतों में भी हैंडसम मुजरिमों को कम सजा

मिलती है। दूसरा सिमिलरिटी। हमशक्ल या

हमारे जैसा। हम उन लोगों को पसंद करते हैं

जो हमारे जैसे दिखते हैं या सोचते हैं।

खिलाड़ी आपकी नकल उतारते हैं। अगर आप कार

बेचने आए हैं और आपकी पिछली सीट पर गोल्फ

की गेंदे रखी हैं तो सेल्समैन तुरंत कहेगा

अरे मुझे भी गोल्फ बहुत पसंद है। तीसरा

कॉम्प्लीमेंट्स यानी जब कोई हमारी तारीफ

करता है तो हम उसके बहुले शिकार बन जाते

हैं। नॉर्थ कैरोलना में एक एक्सपेरिमेंट

हुआ। देखा गया कि

आदमियों ने उस आदमी को सबसे ज्यादा पसंद

किया जिसने उनकी सिर्फ तारीफ की। भले ही

उन्हें पता था कि वह आदमी उनसे काम

निकलवाना चाहता है।

हम उन्हें पसंद करते हैं जो हमारे साथ

मिलकर काम करते हैं। कोऑपरेशन को।

एक जानकार ने लड़कों के कैंप में एक

एक्सपेरिमेंट किया। उसने लड़कों के दो

ग्रुप बनाए। ईगल्स और रेटलर्स उनमें

मुकाबला करवाया तो एक दूसरे के जाने

दुश्मन बन गए। फिर उसने एक चाल चली। उसने

कैंप के पानी की लाइन खराब कर दी। अब

दोनों ग्रुप को प्यास बुझाने के लिए साथ

मिलकर काम करना पड़ा। जैसे ही उन्होंने

साथ मिलकर मुसीबत हल की, उनकी दुश्मनी

दोस्ती में बदल गई।

आपने फिल्मों में देखा होगा कि एक पुलिस

वाला मुजरिम को पीटता है, गालियां देता

है। फिर दूसरा पुलिस वाला आता है, उसे

पानी पिलाता है और कहता है, भाई मेरा

पार्टनर पागल है। वह तुझे 5 साल के लिए

अंदर करवा देगा। तू बस मुझे सच बता दे।

मैं तुझे बचा लूंगा।

यहां दिमाग की कुश्ती चल रही है। बुरा

पुलिस वाला डर पैदा करता है और अच्छा

पुलिस वाला आपका दोस्त बनकर आपसे बात मनवा

लेता है। आपको लगता है वह आपकी मदद कर रहा

है। पर असल में वह भी आपको जेल भेजने का

ही तरीका अपना रहा है।

पसंद नापसंद का हथियार बहुत खामोश है।

अगली बार जब आप किसी अजनबी सेल्समैन को

बहुत ज्यादा पसंद करने लगे तो रुकिए।

अपने आप से पूछिए कि क्या मैं इस सामान को

पसंद कर रहा हूं या इस आदमी को? सामान की

क्वालिटी देखिए। आदमी की मुस्कुराहट नहीं।

जिसके साथ रहेंगे वैसे ही बन जाएंगे। साथ

का असर कंडीशनिंग एंड एसोसिएशन।

डॉक्टर यह लोग मुझे ही क्यों कोसते हैं?

यह एक टीवी पर मौसम बताने वाले वेदरमैन की

रोती हुई आवाज थी। उसे समझ नहीं आ रहा था

कि जब मौसम खराब होता है तो लोग उसे जान

से मारने की धमकी क्यों देते हैं। उस

बेचारे की गलती क्या थी? वह तो बस खबर दे

रहा था। बारिश उसने थोड़ी ही करवाई थी।

मगर उसे नफरत भरे खत मिलते थे। यहां तक कि

उसके ऑफिस के साथी भी लाइव टीवी पर उस पर

तंज कसते थे।

मैंने उसे समझाया कि भाई यह इंसानी दिमाग

का एक बहुत ही पुराना बटन है। इसे कहते

हैं साथ [संगीत] का असर एसोसिएशन।

हम उन लोगों को नापसंद करते हैं जो हमारे

पास बुरी खबर लेकर आते हैं। भले ही उस

बुरी खबर में उनका कोई हाथ ना हो। पुराने

जमाने में पर्सिया के राजाओं का एक कानून

था। अगर कोई मैसेंजर कोई संदेशवाहक जीत की

खबर लाता [संगीत] तो उसे दावतें और इनाम

मिलते। मगर अगर वह हार की बुरी खबर लाता

तो उसे फौरन मौत के घाट उतार दिए जाते।

शेक्सपियर ने भी कहा था बुरी खबर सुनाने

वाले का चेहरा भी बुरा लगने लगता है।

हमारी मदर्स ने हमें बचपन में ही यह दिमाग

का खेल समझा दिया था। याद है? बुरे लड़कों

के साथ मत घूमना। वरना लोग आपको भी बुरा

ही कहेंगे।

मां हमें बुरी असर से बचने के लिए सिखा

रही थी और वह सही भी थी।

लोग यही मानते हैं कि आप जिनके साथ रहते

हैं, आपका नेचर वैसे ही होगा। मगर

ऑपरेटर्स इसका इस्तेमाल आपको लूटने के लिए

करते हैं। वे हमेशा अपनी चीजों को उन

चीजों से जोड़ते हैं जो आपको पसंद है।

आपने अगर ध्यान दिया है कि गाड़ियों के

एडवर्टाइजमेंट में सुंदर मॉडल्स क्यों

खड़ी होती हैं? कार का उस मॉडल की

खूबसूरती से कोई लेना देना नहीं है। मगर

एडवर्टाइजमेंट बनाने वाला दांव लगाता है

कि आपकी पसंद उस मॉडल से फिसल कर उस कार

पर भी आ जाएगी।

खिलाड़ी खिलाड़ियों को पैसे देते हैं ताकि

वह जूते या कोल्ड ड्रिंक बेच सकें। उन्हें

पता है कि अगर आप उस खिलाड़ी को पसंद करते

हैं तो आप उसके हाथ में पकड़ी चीज को भी

पसंद करने लगेंगे। चाहे उस चीज का खेल से

कोई कनेक्शन हो या ना हो।

नेताओं को यह राज बहुत पहले से पता है।

काम निकलवाना हो तो पहले बढ़िया खाना

खिलाइए।

मनोवैज्ञानिक ग्रेगरी रजरान ने एक खोज की

जिसे उन्होंने लंच तकनीक कहा। उन्होंने

देखा कि लोग खाना खाते समय जिन बातों को

सुनते हैं उन्हें वे ज्यादा पसंद करने

लगते हैं। क्यों? क्योंकि खाना खाते वक्त

हमें अच्छा महसूस होता है और वह अच्छी

वाली फीलिंग उन बातों से भी जुड़ जाती है

जो उस वक्त कही जा रही हो। यही वजह है कि

चंदा मांगने वाली पार्टियां हमेशा खाने के

दौरान ही अपनी अपील करती हैं। यानी बटन

दबाओ और टेप चालू। पेट भरा हो तो दिमाग

हां बोलने में ज्यादा समय नहीं लगाता।

खेल के मैदान में यह साथ का असर पागलपन की

हद तक पहुंच जाता है। लोग अपनी टीम के लिए

दंगे कर देते हैं। खिलाड़ियों को मार देते

हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि

अगर उनकी टीम जीतती है तो वे जीत रहे हैं।

ध्यान दीजिए। जब आपके शहर की टीम जीतती है

तो आप कहते हैं हम जीत गए। आप हम शब्द का

इस्तेमाल करते हैं ताकि आप भी उस जीत का

हिस्सा बन सके। मगर जब टीम हारती है तो आप

कहते हैं वह हार गए या स्टेट की टीम पिट

गई।

हम हमेशा खुद को विजेताओं के साथ विनर्स

के साथ जोड़ना चाहते हैं और हारने वालों

से दूर भागना चाहते हैं। यह सब इसलिए है

ताकि दुनिया की नजरों में हमारी इज्जत

बढ़ी रहे। जिन लोगों की अपनी कोई बड़ी

उपलब्धि नहीं होती, वे अक्सर दूसरों की

जीत की आड़ में अपनी इज्जत बनाने की कोशिश

करते हैं।

क्योंकि पसंद नापसंद के नियम के हजारों

रास्ते हैं तो आप हर रास्ते को बंद नहीं

कर सकते। सही तरीका यह है कि जब आप किसी

सेल्समैन से बात कर रहे हो और आपको अचानक

एहसास हो कि अरे मैं तो इस आदमी को जरूरत

से ज्यादा पसंद करने लगा हूं तो वहीं

सावधान हो जाइए।

जैसे ही आपके पेट में यह मरोड़ उठे कि आप

उस आदमी की मुस्कुराहट या उसकी बातों के

जाल में फंस रहे हैं तो एक छोटा सा काम

कीजिए। उस आदमी को उसके सामान से अलग करके

देखिए। याद रखिए आप उस कार को खरीद रहे

हैं उस सेल्समैन को नहीं। कार आपको सड़क

पर चलानी है। उस सेल्समैन को घर लेकर नहीं

जाना। अगर सौदा अच्छा है तो लीजिए मगर

सिर्फ इसलिए मत लीजिए क्योंकि सेल्समैन

आपको अपना भाई जैसा लग रहा है।

चैप्टर छ अथॉरिटी।

वर्जिल ने कहा था कि किसी उस्ताद की बात

मानो।

अथॉरिटी यानी हुकुम का गुलाम या बड़े आदमी

की धौस।

मान लीजिए आप अखबार पढ़ रहे हैं और आपको

एक एडवर्टाइजमेंट दिखता है। याददाश्त

बढ़ाने की खोज के लिए लोग चाहिए। आप

यूनिवर्सिटी पहुंचते हैं और वहां आपको दो

लोग मिलते हैं। एक है रिस्चर खिलाड़ी।

जिसने लैब वाला सफेद कोट पहना है और हाथ

में फाइल पकड़ी है। दूसरा है आपके जैसा ही

एक साधारण आदमी।

सफेद कोट वाला आदमी आपको नियम समझाता है।

वह कहता है कि

यह खेल इस बारे में है कि सजा देने से

इंसान की याददाश्त पर क्या असर पड़ता है।

आप दोनों में से एक बनेगा सीखने वाला

लर्नर और दूसरा बनेगा टीचर यानी उस्ताद।

किस्मत से आप सीखने वाला बन जाते हैं।

सफेद कोट वाला आदमी आपको एक कुर्सी पर

बांध देता है और आपके हाथ में बिजली की

तारें जोड़ देता है। वह कहता है कि बिजली

का झटका बहुत तेज होगा। पर इससे कोई पक्का

नुकसान नहीं होगा। फिर रिस्चर दूसरे कमरे

में चला जाता है [संगीत] और आपसे सवाल

पूछता है। जैसे ही आप गलत जवाब देते हैं,

वह एक बटन दबाता है और आपको बिजली का झटका

लगता है। हर गलती के साथ झटका 15 वोल्ट

बढ़ता जाता है। शुरुआत में तो दर्द सहने

लायक होता है। मगर जैसे-जैसे आप गलतियां

करते हैं, बिजली का करंट बढ़ता जाता है।

65 वोल्ट पर आप कराने लगते हैं। [संगीत]

120 वोल्ट पर आप चिल्लाते हैं। बहुत दर्द

हो रहा है। 150 वोल्ट पर आप चीखते हैं। बस

करो मुझे यहां से निकालो। मुझे नहीं

खेलना।

मगर वो नहीं रुकता। वह सफेद कोट वाले आदमी

की तरफ देखता है और बड़े शांत भाव से कहता

है एक्सपेरिमेंट जारी रखिए। आपके पास और

कोई रास्ता नहीं है।

आप डर के मारे कांप रहे हैं। दीवार पर

लातें मार रहे हैं। रो रहे हैं। पर रिस्चर

बटन दबाता जाता है।

175

210, 225 और आखिर में 450 वोल्ट। अब आप ना

चिल्ला सकते हैं ना हिल सकते हैं। अब बस

उस खौफनाक बिजली को महसूस कर रहे हैं। आप

सोच रहे हैं। यह रिस्चर रुक क्यों नहीं

रहा? वह मेरी मदद क्यों नहीं कर रहा? शायद

आपको लग रहा हो कि यह कोई बुरा सपना है।

मगर हकीकत यह है कि यह एक असली खोज थी जो

प्रोफेसर मिलग्रम ने की थी। उस कमरे में

सीखने वाला शिकार कोई असली झटका महसूस

नहीं कर रहा था। वह तो एक एक्टर था जो

सिर्फ चिल्लाने का नाटक कर रहा था। असली

खोज तो उस उस्ताद पर हो रही थी उस रिस्चर

पर।

सवाल यह था कि अपनी नौकरी बचाने या हुक्म

मानने के लिए एक साधारण इंसान

दूसरे बेगुनाह इंसान को कितना दर्द दे

सकता है?

जवाब आत्मा को रूह को कंपा देने वाला है।

लगभग दो तिहाई लोग

450 वोल्ट के आखिरी बटन तक गए। उन्होंने

तब भी नहीं रोका जब शिकार चिल्ला रहा था,

रो रहा था या बेहोश होने का नाटक कर रहा

था। क्यों? सिर्फ इसलिए क्योंकि सफेद कोट

वाले बड़े आदमी ने उन्हें हुक्म दिया था।

प्रोफेसरों और डॉक्टरों को लगा था कि हजार

में से शायद एक आदमी ही ऐसा करेगा। मगर

जब

देखा गया तो बात कुछ और ही थी। वे लोग ना

तो पागल थे ना ही बुरे। वे बस आपकी और

मेरी तरह भले लोग थे। बड़े आदमी की धौस

यानी अथॉरिटी का हथियार इतना बड़ा है कि

वह हमारी अकल पर पत्थर डाल देता है। बचपन

से ही हमें सिखाया जाता है कि बड़ों की

बात मानो, टीचर की बात सुनो, पुलिस और जज

की इज्जत करो और यह सही भी है। क्योंकि

आमतौर पर इन लोगों के पास हमसे ज्यादा

जानकारी और ताकत होती है। मगर दिक्कत तब

शुरू होती है जब हम सोचना बंद कर देते हैं

और बटन दबा और टेप चालू वाले मोड में आ

जाते हैं। अस्पतालों में इसकी वजह से बहुत

बड़ी गलतियां होती हैं। डॉक्टर को भगवान

माना जाता है। इसलिए अगर वह कोई गलत दवा

भी लिख दे तो नर्स या फार्मासिस्ट उसे

टोकते नहीं है।

एक डॉक्टर ने मरीज के दाहिने कान राइट ईयर

में डालने वाली दवा की पर्ची पर लिख दिया

प्लेस इन आर ईयर। नर्स ने उन्हें आर ईयर

का मतलब निकाला रियर और कान की दवा मरीज

के इनस में डाल दी। कान के दर्द का वहां

से क्या लेना देना। मगर नर्स ने दिमाग

नहीं लगाया क्योंकि हुक्म ऊपर से आया था।

असली ऑपरेटर्स जानते हैं कि आपके पास असली

ताकत होने की जरूरत नहीं है। बस ताकत का

निशान होना काफी है। सिंबल्स ऑफ अथॉरिटी।

जैसे पहला है ओहदा टाइटल्स। अगर कोई अपने

नाम के आगे डॉक्टर या प्रोफेसर लगा ले तो

लोग उसे ज्यादा अकलमंद समझने लगते हैं। एक

खोज में देखा गया कि जब एक आदमी को

स्टूडेंट के बजाय प्रोफेसर बताकर

इंट्रोड्यूस किया गया तो लोगों को वह पहले

के मुकाबले 2 1/2 इंच ज्यादा लंबा लगने

लगा। यानी रुतबा बढ़ते ही कद भी बड़ा हुआ

ऐसा दिखने लगा। दूसरा कपड़े।

वर्दी का जादू सर चढ़कर बोलता है। एक

एक्सपेरिमेंट में एक लड़के ने सड़क पर

चलते लोगों से कहा, वहां खड़े आदमी को 10

पैसे दे दो। जब उसने साधारण कपड़े पहने

थे, तो कम लोगों ने बात मानी। मगर जैसे

उसने गार्ड की वर्दी पहनी,

92% लोग मान गए।

यही खेल सूट बूट वाले ठग भी खेलते हैं।

वे शानदार थ्री पीस सूट पहनकर बैंक

अधिकारी बनकर आते हैं और लोगों की मेहनत

की कमाई डकार जाते हैं। उनके कपड़े हमें

यकीन दिला देते हैं कि वे भरोसेमंद हैं।

तीसरा तामझाम।

महंगी गाड़ियों और गहने भी धौस जमाते हैं।

सैन फ्रांसिस्को में देखा गया कि अगर कोई

खटारा गाड़ी हरी लाइट होने पर खड़ी रहे तो

पीछे वाले तुरंत हॉर्न बजाने लगते हैं।

मगर अगर वही गाड़ी कोई लग्जरी कार हो तो

50% लोग शांति से इंतजार करते हैं। उन्हें

उस गाड़ी की चमक-धमक से डर लगता है।

इस अथॉरिटी से बचने के लिए अपने आप से दो

सवाल पूछिए। पहला क्या यह इंसान सच में

एक्सपर्ट है? जैसे ही आप किसी बड़े आदमी

यानी अथॉरिटी को देखें, उसकी वर्दी या नाम

को भूल जाइए। उसकी काबिलियत देखिए। क्या

वह उस काम के बारे में सच में जानता है?

एडवर्टाइजमेंट में डॉक्टर का रोल निभाने

वाला एक्टर डॉक्टर नहीं होता। वह तो बस

सिल्वर स्क्रीन [संगीत] का खिलाड़ी है।

दूसरा सवाल, क्या यह इंसान यहां सच बोल

रहा होगा? [संगीत] कभी-कभी

एक्सपर्ट भी अपना फायदा देखते हैं। चालाक

वेटर एक गजब की चाल चलते हैं। वे आपसे

कहेंगे साहब [संगीत] आज यह डिश अच्छी नहीं

है। आप इसकी जगह यह सस्ती वाली डिश लीजिए।

आपको लगेगा वाह यह आदमी तो मेरा भला चाह

रहा है। जैसे ही उसने अपना नुकसान करके

आपका भला किया। आपने उसे ईमानदार मान

लिया। अब इसके बाद वह जो भी महंगी शराब या

मिठाई बताएगा।

[संगीत]

आप आंख बंद करके मान लेंगे।

यानी बटन दबाओ और आपका टिप चालू। उसने

पहले छोटा सा नुकसान सहा ताकि बाद में

आपकी जेब काट सके।

चैप्टर सेवन स्केसिटी।

किसी चीज को प्यार करने का सबसे अच्छा

तरीका यह सोचना है कि वह खो सकती है। जीके

चिस्टटन ने ऐसा कहा।

मेजोना के मेसा शहर में रहता हूं। वहां

मॉर्मन पंथ का एक बहुत बड़ा और सुंदर

मंदिर है। मैं सालों तक उसके पास से

गुजरा। पर कभी अंदर जाने की इच्छा नहीं

हुई। मगर एक दिन अखबार में खबर छपी कि

मंदिर के एक खास हिस्से को जहां सिर्फ पंथ

के पक्के लोगों को जाने की इजाजत होती है।

आम जनता के लिए सिर्फ कुछ दिनों के लिए

खोला जा रहा है। उसके बाद वह हिस्सा हमेशा

के लिए बंद हो जाएगा।

जैसे ही मैंने यह पढ़ा, मेरा बटन दबा और

टेप चालू हो गया। मुझे अचानक उस मंदिर को

देखने की तड़प होने लगी। जब मैंने अपने

दोस्त को साथ चलने को कहा तो उसने कहा,

तुझे अचानक मंदिर में इतनी दिलचस्पी कैसे

हो गई? तू तो ना धर्म को मानता है ना तुझे

पुरानी इमारतों का शौक है। तब मुझे एहसास

हुआ कि मुझे उस मंदिर से कोई लेना देना

नहीं था। मुझे तो बस इस बात की खुजली थी

कि अगर मैं अभी नहीं गया तो आखिरी मौका

हाथ से निकल जाएगा। [संगीत]

यह नियम बहुत सीधा है। जब हमें लगता है कि

कोई चीज कम मिल [संगीत] रही है या हाथ से

निकलने वाली है तो वह हमें और भी कीमती

लगने लगती है। हम इंसान पाने की खुशी से

ज्यादा खोने के डर से भागते हैं।

खिलाड़ी जानते हैं कि आपकी जेब कैसे ढीली

करनी है। वे दो मेन तरीके अपनाते हैं।

पहला सामान की कमी। सेल्समैन आपसे कहेगा

[संगीत] साहब इस इंजन वाली सिर्फ पांच

गाड़ियां बची हैं। उसके बाद यह मॉडल आना

बंद हो जाएगा। यह प्रोडक्शन पीछे चल रहा

है। पता नहीं अगला स्टॉक कब आएगा। चाहे यह

सच हो या झूठ। इसका मकसद आपकी आंखों में

उस चीज की कीमत बढ़ाना है। दूसरा है समय

की कमी। डेडलाइन। सिर्फ आज के लिए या

धमाका सेल रात 12:00 बजे खत्म हो जाएगी।

लोग अक्सर वह काम भी कर लेते हैं जो वह

नहीं करना चाहते। सिर्फ इसलिए क्योंकि समय

कम बचा है।

मैंने एक कान में देखा कि सेल्समैन एक कपल

को फ्रिज देखते हुए पकड़ लेता है। वह कहता

है, सर, आपको यह मॉडल पसंद है। बहुत

बढ़िया मशीन है। पर अभी 20 मिनट पहले ही

मैंने इसका आखिरी पीस दूसरे कपल को दे

दिया। कस्टमर का चेहरा उतर जाता है। अचानक

वह फ्रिज उन्हें दुनिया की सबसे जरूरी चीज

लगने लगती है। तब सेल्समैन दांव खेलता है।

अगर मैं पीछे गोदाम में चेक करूं और कहीं

से एक पीस मिल जाए तो क्या आप इसी वक्त

इसे इसी दाम पर खरीद लेंगे? ग्राहक तुरंत

हां बोल देता है। तो बटन दबा और टिप चालू।

ग्राहक ने उस वक्त सौदा पक्का किया जब उसे

लगा कि सामान मिल ही नहीं सकता।

जब कोई चीज कम होने लगती है तो हमारी

आजादी छीनने लगती है। हमें लगता है कि हम

अपनी मर्जी से चुनाव नहीं कर पा रहे हैं

और हम इंसानों को अपनी आजादी खोने से नफरत

है।

यह खेल दो साल की उम्र से शुरू हो जाता है

जिसे खतरनाक दो साल कहते हैं। एक

एक्सपेरिमेंट में दो साल के बच्चों के

सामने दो खिलौने रखे गए। एक खुला था और

दूसरा कांच की दीवार [संगीत] के पीछे।

जैसे ही बच्चों को लगा कि कांच वाला

खिलौना पाना मुश्किल है, वह पागलों की तरह

उसी के पीछे भागने लगे।

यही हाल टीनएजर्स का है। इसे रोमियो

जूलियट असर कहते हैं। मां-बाप जितना प्यार

पर पाबंदी लगाते हैं, आशिकों का प्यार

उतना ही गहरा और पागलपन भरा होता जाता है।

पाबंदी ही उस प्यार का फ्यूल बन जाती है।

जब किसी जानकारी या सामान पर सेंसरशिप या

पाबंदी लगती है तो लोग उसे और ज्यादा पाने

की कोशिश करते हैं और उस पर और ज्यादा

यकीन करने लगते हैं।

जब मियामी शहर में खास तरह के डिटर्जेंट

पर बैन लगा तो लोगों ने उसकी तस्करी शुरू

कर दी। लोग कहने लगे कि बैन वाला साबुन

कपड़े ज्यादा सफेद होता है जबकि वह पहले

जैसा ही था।

आखिरी मौका तब सबसे ज्यादा खतरनाक होता है

जब उसमें मुकाबला जुड़ जाए। जब हमें लगता

है कि कोई दूसरा इंसान हमारी पसंद की चीज

छीन लेगा तो हमारा दिमाग काम करना बंद कर

देता है। इसे

फीडिंग फ्रेंजी यानी खाने का पागलपन कहते

हैं। मछुआरे पानी में खूब सारा चारा फेंक

देते हैं। जिससे मछलियां एक दूसरे से

मुकाबला करने लगती हैं और पागल होकर खाली

हुक भी निकल जाती हैं।

दुकानदार भी यही करते हैं। वे एक ही वक्त

पर तीन ग्राहकों को एक ही पुरानी कार

दिखाने के लिए बुला लेते हैं। जब पहला

ग्राहक कार देख रहा होता है और दूसरा

इंतजार कर रहा होता है तो पहले ग्राहक को

लगता है कि अगर मैंने अभी फैसला नहीं लिया

तो यह दूसरा इंसान ले जाएगा। वह बिना सोचे

समझे पैसे दे देता है।

इस आखिरी मौका के जाल से बचने के लिए दो

कदम उठाइए। पहला शरीर की गर्मी को

पहचानिए। जैसे ही आपको लगे कि आपकी धड़कन

तेज हो रही है, हाथ कांप रहे हैं और आप

हड़बड़ी में फैसला ले रहे हैं तो रुक

जाइए। यह आपका बटन दबने का संकेत है। खुद

को शांत कीजिए।

दूसरा इस्तेमाल या कब्जा? अपने आप से

पूछिए। मुझे यह चीज क्यों चाहिए? या सिर्फ

इसलिए कि यह किसी और के पास ना चली जाए तो

फिर यह बहुत महंगी पड़ सकती है।

क्या इसलिए क्योंकि मुझे इसे इस्तेमाल

करना है यानी फंक्शन।

याद रखिए कि जो बिस्किट कम मिलते हैं वह

खाने में ज्यादा स्वाद नहीं होते।

चीज की कमी उसकी क्वालिटी नहीं बढ़ाती।

अगर कार खराब है तो वह इस बात से अच्छी

नहीं हो जाएगी कि उसे खरीदने के लिए 10

लोग लाइन में खड़े हैं। आखिरी मौका यानी

स्केरसिटी का हथियार हमें सोचने का वक्त

नहीं देता। अगली बार जब कोई कहे कि बस

आखिरी पीस बचा है तो समझ जाइए कि वह आपकी

दिमाग की नींद का [संगीत] फायदा उठा रहा

है। आंख खोलिए और अपनी शर्तों पर सौदा

कीजिए।

आज के लिए बस इतना ही। हम फिर मिलेंगे

आपसे एक नए एपिसोड में एक नई किताब के

साथ। मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे

सिलेबस वि रोहित। धन्यवाद।